Sunday, December 15, 2013

उलझ चूका हूँ

जब भी मैं एकांत में होता हूँ, सोंचता हूँ मैं कौन हूँ
क्या हूँ , कहाँ था , क्या था , कहाँ हूँ और क्या हो गया हूँ
कहाँ से आया था कहाँ पे आ गया हूँ , उलझ चूका हूँ
जिंदगी मेरी किस मोड़ पे आ गयी है , कहाँ को जाएगी
पेड़ बहुत ऊँची हो गयी है मगर जड़ का कोई अस्तित्व नहीं है
घबरा गया हूँ कहीं वो फुनगी टुटके नीचे न गिर जाये
चोट लगेगी जब वो जमीं पे गिरेगा और फिर कौन जानता है
की कल हो के उठ पाए की नहीं, अब समझ चूका हूँ

क्या है मेरा लक्ष्य कहाँ है मेरी नाव कहाँ है उसका पतवार
सागर की किस मध्य में आ गया हूँ, जल का प्रवाह किस दिशा में है
किनारा कोसों दूर भी नहीं दिख रहा है फिर भी मैं बह रहा हूँ
बिना पतवार के , उसी जल के धार में, उसी दिशा में
मुझे किस मंजिल को पहुंचाएगी, क्या मुझे वहां कोई जानेगा
क्या कोई मुझे पहचानेगा , क्या कोई मुझे समझ पायेगा
सारी उम्मीदें मैं अब भूल गया हूँ , अब उलझ चूका हूँ

अब मैं थक गया हूँ अब सोना चाहता हूँ गहरी नींद में
मत उठाना मुझे कोई अब धरती के गोद में समाना चाहता हूँ
मगर फिर से उठूँगा मैं अपना अधुरा खाब को पूरा करने के लिए
अपना सपना को फिर से संवारने के लिए दोबारा आना चाहता हूँ
कुछ रिश्ते अधूरे रह गये हैं उनको पूरा करना चाहता हूँ
पता नहीं किस विश्वास से मैं ये कह रहा हूँ जैसे कुछ मेरे लिए कुछ लिखा गया हो
मैं अब जा रहा हूँ, और जा चूका हूँ , पूर्ण रूप से उलझ चूका हूँ
-------- पुष्प रंजन कर्ण

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